शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

अपने मोहब्बत का इम्तिहान 'सागर' मैं और कैसे देता

हमें  लगा  की  हम  ही  उन्हें  देख  रहे  थे ।
मगर छुप - छुप कर वो भी हमे देख रहे थे ।।
एक नज़र में ही उसने मुझे कर दिया दिया पागल ।
हम  तो  उसकी  नज़र  का  असर  देख  रहे  थे ।।
कैसे  कह  दूँ  की  मेरा  अपना  नहीं  है  कोई ।
मुझे अपना सा लगा वो इस क़दर देख रहे थे ।।
छोड़ा  है  साथ  उसने  साया  छोड़ता  नहीं ।
वो उधर नज़र आया हम जिधर देख रहे थे ।।
मुझे लगा जैसे मेरा जनाजा निकल रहा हो ।
जब सामने से अपने उसकी निकलती डोली देख रहे थे ।।
अपने मोहब्बत का इम्तिहान 'सागर' मैं और कैसे देता ।
जिसने पलटकर नहीं देखा हम उसकी धूल देख रहे थे ।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्कार !
    बहुत सुन्दर रचना
    आपका ब्लॉग देखकर अच्छा लगा !
    मै आपके ब्लॉग को फॉलो कर रहा हूँ
    मेरा आपसे अनुरोध है की कृपया मेरे ब्लॉग पर आये और फॉलो करें और अपने सुझाव दे !

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    1. धन्यवाद !
      आप ने मेरा ब्लॉग फॉलो किया मुझे अच्छा लगा।
      मैंने आपका ब्लॉग देखा मुझे पसंद आया , मैं आपके ब्लॉग को फॉलो कर रहा हूँ।

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