गुरुवार, 27 नवंबर 2014

हमने ज़िन्दगी अपनी उसको समझा ।

चित्र  स्रोत :- गूगल
हमने उससे मोहब्बत की जिसके पास दिल नहीं था ।
ऐसे  दरिया  में  कूंदे  जिसका  साहिल  नहीं  था ।।
हमने     ज़िन्दगी     अपनी     उसको     समझा ।
जिसका    प्यार   भी   मुझे  हासिल   नहीं   था ।।
यह     सोचकर    उसने     मुझे    ठुकरा    दिया ।
उन्हें   लगा   की   मैं   उनके   क़ाबिल   नहीं  था ।।
मेरी नादान  मोहब्बत ने  उसे ख़ुदा  समझ लिया ।
जो   ख़ुदा   तो  दूर  खुद  का  कामिल   नहीं  था ।।
अगर   थी   मेरी   गलती   तो   बस   इतनी   थी ।
मैं  बेवफाओं  की  लिस्ट   में  शामिल  नहीं  था ।।
उस   पर   इल्ज़ाम   क्यों   लगाते   हो   "सागर" ।
वो    महबूब    था    तेरा    क़ातिल    नहीं    था ।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (28.11.2014) को "लड़ रहे यारो" (चर्चा अंक-1811)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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    1. चर्चा मंच , ........ बहुत अच्छा प्रयास। धन्यवाद राजेंद्र जी

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  2. हमने ज़िन्दगी अपनी उसको समझा
    ये पंक्ति तो बहुत ही ख़ूबसूरत है ...

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    1. शुक्रिया शारदा जी। हौसला आफजाई करने के लिए।

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  3. बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

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  4. उन्हें लगा की मैं उनके क़ाबिल नहीं था ।।
    मेरी नादान मोहब्बत ने उसे ख़ुदा समझ लिया ।
    वाह

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  5. हमने उससे मोहब्बत की जिसके पास दिल नहीं था ।
    ऐसे दरिया में कूंदे जिसका साहिल नहीं था ।
    ..........बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं !!

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    1. संजय जी बहुत बहुत धन्यवाद कमेंट्स और ब्लॉग विजिट करने के लिए।

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